बचपन ~

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एक बचपन देखा, प्यारा सा, सबसे अच्छा, कुछ न्यारा सा !
घर के उस कोने पे, छोटा सा वो पलना देखा,
उस पुराने आँगन पे खुद का, गिर-पड़ कर वो चलना देखा !
दुपहरी की वो धूप भी देखी, वो सूरज का आग उगलना देखा,
नींद भरी उन आँखों को फिर, हांथो से मसलना देखा !
वो धूप से बचकर चलना देखा, पैरों का वो जलना देखा !
दिन भर की उस खेल-कूद संग, शाम का जल्दी ढलना देखा !
कुछ दोस्त भी देखे, अपने से, जो रोज मिलाते सपनो से !
वो बिन मतलब की बातें देखीं, वो रात रात भर पढना देखा,
वो छोटी छोटी बातों में, लड़ना और झगड़ना देखा !
फिर एक दिन सबसे यूँ ही, खुद का यूँ बिछड़ना देखा !
कुछ खुशियाँ देखी, ग़म भी देखे, कुछ ज्यादा, तो कुछ कम देखे !
सर्दी की ख़ामोशी देखी, टिप-टिप करती बारिश देखी !
ऐसे प्यारे मौसम में, पल पल जीने की गुजारिश देखी !
एक बचपन देखा, प्यारा सा, सबसे अच्छा, कुछ न्यारा सा !

माँ ~

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लोरी सुन, उस माँ की, झट से, मैं सो जाता था,
पैसे लेकर जब मैं माँ से, गुल्लक रोज सजाता था !
एक भी खिड़की मेरे खेल से, जब “ना” बच पाती थी !
ढाल बनकर, मुझे बचाने “माँ”, सब से ही लड़ जाती थी !
माँ के जैसा, “ना” कोई दूजा, माँ तो बस “एक ही” है,
नित, चरणों में अपनी माँ के, मैंने जन्नत देखी है !

पापा की उस डांट से अक्सर, मुझको कौन बचाती थी !
होम-वर्क के उस चक्रव्यूह को प्रतिदिन, माँ ही तो तुडवाती थी !
जब बचपन में, मुझको अक्सर, सर्दी बड़ा सताती थी,
हल्दी वाला दूध पिलाकर, मुझको कौन सुलाती थी !
माँ के जैसा, “ना” कोई दूजा, माँ तो बस “एक ही” है,
नित, चरणों में अपनी माँ के, मैंने जन्नत देखी है !

उस माँ के खातिर, पास-दूर क्या, अब भी उसके, “नूर” हैं हम !
जीवन की इस भाग-दौड़ में, माँ से कितना दूर हैं हम,
साथ ना देगा, कोई भी तेरा, चाहे तू हो बिलकुल सच्चा,
एक माँ ही है, साथ हमेशा, है तू जो उसका बच्चा !
माँ के जैसा, “ना” कोई दूजा, माँ तो बस “एक ही” है ,
नित, चरणों में अपनी माँ के, मैंने जन्नत देखी है !

एक पल को ही सही, ख़ुशी तो मिली ~

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एक पल को ही सही, ख़ुशी तो मिली,
उस अँधेरे रास्ते में, फिर रौशनी तो मिली !
इन चंद पलों को पाने में,
जिंदगी यूँ ही गुजर जाती है,
कुछ को अँधेरा, तो रौशनी कुछ की हमदम बन जाती है !
खैर, ये रौशनी हमेशा नहीं रह सकती,
ये सुहानी हवा, हमेशा नहीं बह सकती !
एक नए दिन के इंतज़ार में आज, एक और शाम, ढली,
“एक पल को ही सही”, ख़ुशी तो मिली !

तो पुकार लेना ~

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निर्माण की इस जंग में,
सदा वीरों को गुहार देना !
कमी पड़े वतन पे मिटने वालों की,
तो पुकार लेना !
फिर होगी एक सुबह,
जब हर चेहरा खुश होगा !
सच की राह में बढ़ने को,
हर पग उत्सुक होगा !
इस दिखावे के मुखौटे को,
तुम बस उतार देना !
कमीं पड़े सच्चे मुखौटों की,
तो पुकार लेना !
राह में यूँ ही चलकर,
तुम कल को सवांर देना !
कमीं हो हमराहियों की,
तो पुकार लेना !

कुछ गलियां हैं पहचानी सी, कुछ चेहरे हैं अनजाने से ~

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टूटी इमारत की वो इंटें, खुद का इतिहास बताती हैं,
मुझको उस परिसर में पाकर, कुछ कहने को इतराती हैं !
सुबह सुबह उस प्रांगन में, अब कौन ऋचाएं गाता है,
कोलाहल के उस आसमान में अब, एक सन्नाटा मंडराता है !
वो जर्जर होता दरवाजा, जिसने मुझको कभी छिपाया था,
बचपन के उन खेलो में, खुद का मकसद बतलाया था !
बरगद का वो पेड़ खड़ा, कुछ याद सा करता दिखता है,
अपनी शाखाओं से तल पर, कुछ प्यारी यादें लिखता है !
वो नल तो अब टूट गया है, जिसने मेरी प्यास बुझाई थी,
मतवालों का वो झुण्ड कहाँ, जिसमें मेरी ही अगुवाई थी !
उस विद्यालय को देख अचानक, ना रोक सका मिलवाने से,
अब, कुछ गलियां हैं पहचानी सी, कुछ चेहरे हैं अनजाने से !

माना, कि ये रास्ता अभी, मुश्किल है, अनजाना है ~

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ख्यालों की इस दुनिया से बढ़कर, हमें कहीं दूर जाना है,
माना, कि ये रास्ता अभी, मुश्किल है, अनजाना है !
रौशनी से, पूरा कारवां रोशन होगा एक दिन,
माना, कि अभी चिरागों को, एक शोला और दिखाना है !
विचलित से, इस मन को, हमें फिर समझाना है,
माना, कि ये सपना, अभी बस, एक अफसाना है !
एक साथ चलकर, हमें हकीक़त से मिल जाना है,
माना, कि ये रास्ता अभी, मुश्किल है, अनजाना है !!

ऐसा है ये, अपना देश ~

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कितने चेहरे, कितनी भाषा,
हर जीवन की है, एक आशा !
कितने चौखट, कितनी गलियां,
कितने पर्व, कितनी हैं रंग-रलियाँ !
कितने दिन और कितनी रातें,
न जाने, कितनी हैं बातें !
कितने गम और कितनी खुशियाँ,
कितने सपने, कितनी हैं रुचियाँ !
कितने अनेक, पर, कितने हैं ‘एक’,
ऐसा है ये, अपना देश !

डर और चिंता दो थीं बहने ~

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डर और चिंता दो थीं बहने,
बेघर हो, एक नए ‘मन’ से,
दूजे में, आई थीं, वो रहने !
चिंता थोड़ी छोटी थी,
डर तो थी, विशाल बड़ी !
उस नए मन के ‘सन्नाटे’ में,
बन बैठी वों, मजबूत कड़ी !
कितने दिन उन दोनों ने,
उस मन पे, अपना वास किया,
उस मन के अच्छे, सपनों पर,
दोनों ने, खूब परिहास किया !
फिर एक दिन, उस मन ने,
उकसाकर, खुद को यूँ ही, ‘पहचाना’ !
डर और चिंता दोनों का,
फिर, छूट गया वो, ‘ठिकाना’ !
अब फिर वो दोनों बहने,
यूँ, राह में अक्सर मिलतीं हैं !
चिंता थोड़ी सुधर गयी है,
डर के अब भी क्या हैं कहने !
..बेघर हो, एक नए ‘मन’ से,
दूजे में, आई थीं, वो रहने,
डर और चिंता दो थीं बहने !

ऐ काश ~

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ऐ काश, कि मै भी उड़ पाता,
तो दूर कहीं, उस नभ को मै,
रोज सवेरे छू आता !
मदमस्त परिंदे सा उड़कर मैं,
अपने पंखो को फैलाता !
ऐ काश, कि बचपन फिर आता,
मै छोटा बच्चा बन जाता !
अपने, अपनों के चेहरों पे,
मुस्कान छोड़कर, इतराता !
ऐ काश, सब ही खुश होते,
न क्लेश, न इतने दुःख होते !
बेबाक लुटाने को हर एक पल,
ढेरों सारे सुख होते !
ऐ काश, के ऐसा हो पाए,
हम जो चाहें वो मिल जाये !!

यूँ ही चला जा रहा हूँ मैं ~

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खुद को ढूंढता हुआ,
यूँ ही चला जा रहा हूँ मैं !
एक वीरान से रास्ते पे, एक रोशनी की तलाश में,
एक ख्वाब के पीछे, उसके सच होने की आश में !
जज्बा है मुझमें, ठोकरों से टकराने का,
गिरकर, उठने का और आगे बड़ते जाने का !
हर एक दिन अब, खुद को पा रहा हूँ मैं,
…खुद को ढूंढता हुआ,
यूँ ही चला जा रहा हूँ मैं !!